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Dolphins in Varanasi: वाराणसी गंगा में डॉल्फिन की अठखेलियां, रोज नजर आती हैं 30-40 डॉल्फिन; हर 2 मिनट पर लेती हैं उछाल

मुल्क तक न्यूज़ टीम, वाराणसी. Dolphins in Varanasi: वाराणसी में इन दिनों राष्ट्रीय जलीव जीव डॉल्फिन की अठखेलियां काफी आम हो गईं हैं। सूं-सूं की आवाज करती हुईं रोजाना 30-40 डॉल्फिन और उनके बच्चे गंगा में ऊपर सतह तक आ जाते हैं। यह सीन देख घाट के आसपास लोग और स्थानीय मछुआरे काफी उत्साहित हैं। वहीं, इन दिनों गांगेय डॉल्फिन की अठखेलियां देखने पहुंची अमेरिका की रोन्नी जैकारंडा ने भी कई फोटोग्राफ्स अपने कैमरे में कैद किए।

गंगा प्रहरी और वन विभाग के फील्ड असिस्टेंट नागेंद्र निषाद ने कहा, ''हर 30 से 120 सेकेंड के बाद पानी में आपको अठखेलियां दिख जाएंगी। डाॅल्फिन श्वांस लेने के लिए कुछ समय पानी से ऊपर आ जाती हैं। ढाका घाट पर भारतीय वन्यजीव संस्थान के द्वारा डाॅल्फिन के बारे में सभी जानकारी के लिए साइनबोर्ड भी लगाया गया है। वहीं, पर्यटकों के लिए सेल्फी प्वाइंट भी तैयार किया गया है। अब यह पर्यटन क्षेत्र के तौर पर विकसित हो रहा है। वहीं, वाराणसी में डाॅल्फिन की बढ़ोतरी देख मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी खुशी जाहिर की है। उन्होंने पिछले सप्ताह एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि वाराणसी के निचले हिस्से में डॉल्फिन के बढ़ने की रिपोर्ट आ रही है।''

गंगा में घटा है ध्वनि और केमिकल प्रदूषण

नागेंद्र बोले कि बरसों बाद गंगा में डॉल्फिन का ये नजारा देखने को मिल रहा है। यह आंखों को काफी सुखद अनुभव दे रहा है। इसका अर्थ है कि गंगा अब साफ हो रहीं हैं। गंगा किनारे रहने वाले समुदाय को डाॅल्फिन, कछुआ, घड़ियाल, मगरमच्छ के बारे में अवेयरनेस तेज कर दी गई है। विलुप्त हो रहे जलीय जीव के बारे में अब मछुआरों को समझ में आने लगा है। वाराणसी के मछुआरे डॉल्फिन काे सोंइस भी कहते हैं।

2010 में राष्ट्रीय जलीय जीव और 2020 में प्रोजेक्ट डॉल्फिन

केंद्र सरकार ने 18 मई, 2010 को डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था। वहीं 15 अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किला से डॉल्फिन प्रोजेक्ट लांच किया था। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य नदियों और समुद्रों, दोनों की ही डॉल्फिन को संरक्षित करना है। हालांकि, आज करीब दो साल बाद भी यह प्रोजेक्ट बहुत गति पकड़ नहीं सका है। गंगा में मिलने वाली डॉल्फिन का वैज्ञानिक नाम 'प्लेटेनिस्टा गैंजेटिका' है। इसे ‘सोंस’ भी कहा जाता है।

गंगा में बची हैं 2 हजार के आसपास डॉल्फिन

यह कोई मछली नहीं, बल्कि स्तनधारी जीव है। कहा जाता है कि इसे शोरगुल बिल्कुल भी पसंद नहीं है। नदी में बांधों और बैराज बनने से इनके अस्तित्व पर संकट आ गया। वहीं रही-सही कसर गंगा के प्रदूषण ने निकाल दी। इस समय गंगा में 2 हजार से भी कम डॉल्फिन बताई जाती हैं।

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