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कहानी: बिनब्याही मां

स्कूल में नीलम के साथ विकास का झगड़ा हुआ. इस झगड़े में विकास ने उस की बाजू पर काट लिया. स्कूल से लौटते समय सुजाता ने नीलम से झगड़े के बारे में पूछा.

 सर्दी की खिलीखिली सी दोपहर में जैसे ही स्कूल की छुट्टी की घंटी बजी, मैं और मेरी सहेली सुजाता रोज की तरह स्कूल से बाहर आ गए. स्कूल के गेट के बाहर छोटेछोटे दुकानदारों ने अपनी अस्थायी दुकानें सड़क के किनारे, ठेले पर और साइकिल के पीछे लगे कैरियर पर बंधे लकड़ी के डब्बों में सजा रखी थीं, जिन में बच्चों को आकर्षित करने के लिए तरहतरह की टौफियां, चाट, सस्ती गेंदें व खिलौने के अलावा पेनकौपी भी थीं.

मैं ने एक साइकिल वाले से अपना पसंदीदा खट्टामीठा चूरन लिया और सुजाता के साथ रेलवे लाइन की ओर बढ़ गई. सुजाता बारबार मेरी ओर बेचैनी से देख रही थी, लेकिन कुछ बोल नहीं रही थी. रेलवे लाइन पार करने के बाद आखिरकार उस से रहा नहीं गया और उस ने मुझ से पूछा, “नीलम, सुना है, आज तेरी विकास से लड़ाई हो गई थी?”

“हां, तो उस में कौन सी नई बात है. अकसर होती है, पर बाद में दोस्ती भी तो हो जाती है,” मैं ने लापरवाही से चूरन की पुड़िया से उंगली में चूरन ले कर चाटते हुए कहा.

“बात तो कुछ नहीं, लेकिन मुझे पता चला कि उस ने तेरे हाथ पर काट भी लिया था,” उस ने बहुत रहस्यात्मक ढंग से कहा, तो मैं ने उस की ओर सवालिया निगाह से देखा और फिर अपने हाथ को देखा, जहां उस ने काटा था, अब तो वहां कोई निशान भी नहीं दिख रहा था.

“तो क्या हुआ? अब तो ठीक है सब. मैं ने भी उस के 2 बार काटा बदले में,” मैं ने शेखी बघारते हुए उसे बताया, जबकि मैं खुद डेढ़ पसली की थी. 10 साल की उम्र के हिसाब से मैं काफी दुबली थी, जबकि मेरी हमउम्र सहेलियां मुझ से बड़ी दिखती थीं.

मेरी सहेली ने बेचारगी से मेरी ओर देखा, “नीलम, लड़ाई तो होती है, पर विकास ने तुझे काटा, यह सही नहीं हुआ.”

“क्यों…?” अचानक मुझे लगा, शायद उसे मेरी चोट की चिंता हो रही है. आखिर मेरी पक्की सहेली जो थी वह.

“अरे बुद्धू, मुझे कुछ नहीं हुआ. देख, अब तो दिख तक नहीं रहा कि उस ने मुझे कहां पर काटा था,” हंसते हुए मैं ने अपना हाथ उस के सामने कर दिया.

सुजाता ने मेरा हाथ झटक दिया, “तुझे सच में नहीं पता क्या कुछ?”

मैं ने इनकार में सिर हिला दिया.

“तो सुन, मेरी बूआ ने बताया था कि अगर लड़का किसी लड़की को काट लेता है, तो उस के बच्चा हो जाता है. अब समझ आया कुछ,” सुजाता ने अपनी आंखें गोल करते हुए मुझ से कहा.

‘ हें… तू सच कह रही है क्या सुजाता?’ मेरी स्थिति तो सांप सूंघने जैसी हो गई. मैं अविश्वास से उसे देख रही थी, लेकिन उस ने दोबारा से वही बात कही. उस की बूआ ने उसे बताया है, तब तो यह बात सच ही होगी. बड़े लोग सब जानते हैं. मेरी आंखों में डर भर गया.

घर आ कर मैं बहुत बेचैन हो गई. मैं ने बस्ता एक तरफ रखा और कच्चे आंगन में पड़ी चारपाई पर बैठ गई.  ‘क्या करूं… मम्मी को बताऊं या नहीं. मेरी तो कोई गलती भी नहीं थी.’

मम्मीपापा मुझे और मेरे भाई को ज्यादा टीवी नहीं देखने देते थे, पर मैं ने कुछ फिल्में देखी थीं, जिन में से 1-2 में मैं ने देखा था कि बिनब्याही मां को कितना कुछ सहना पड़ता है. अड़ोसपड़ोस के लोग खूब ताने देते हैं.

मुझे बहुत डर लग रहा था कि पता चलने पर मम्मीपापा बहुत पिटाई करेंगे, कहीं घर से निकाल दिया तो मैं कहां जाऊंगी. किसी रिश्तेदार के घर गई तो वे भी कितने दिन रखेंगे और सच पता चलने पर धक्के मार कर मुझे निकाल देंगे.

“अरे, कब से स्कूल से आ कर बैठी है, कपड़े बदल कर रोटी खा ले, मुझे पड़ोस में कीर्तन में जाना है,” मम्मी की आवाज सुन कर मैं बेमन से उठी और हैंडपंप के पास भरी रखी बालटी से पानी ले कर हाथपैर धो कर अंदर जा कर स्कूल ड्रैस बदल कर नीली फ्राक पहन ली.

खाना खा कर मैं वापस चारपाई पर लेट गई. शाम को सुजाता खेलने के लिए बुलाने आई, लेकिन मुझे उदास देख कर वह मेरे पास बैठ गई.

“अब क्या होगा नीलम? मम्मी को बताया तू ने?”

“नहीं, हिम्मत ही नहीं हुई,” इतनी देर से रुके मेरे आंसू गालों पर लुढ़कने लगे.

“पर, बताना तो पड़ेगा, वरना जब तेरा पेट बड़ा होने लगेगा तब तो उन्हें पता चल ही जाएगा, फिर…?” सुजाता के कहने पर मैं और भी परेशान हो गई.

रात में मैं ने शीशे में खुद को ध्यान से देखा कि कहीं मेरा पेट निकलने तो नहीं लगा, लेकिन अभी तक तो सब ठीक था.

अगले दिन स्कूल में बेचैनी से मैं विकास के आने का इंतजार करने लगी. आखिर उसी के कारण तो मैं इस परेशानी में थी.

सुजाता ने मुझे बहुत सहानुभूति से देखते हुए मेरा हाथ पकड़ रखा था. इस समय मुझे वह अपनी सब से बड़ी शुभचिंतक लग रही थी.

क्लास में विकास के आते ही उस ने मेरा हाथ दबाया और आंखों ही आंखों में मुझे उस से बात करने का इशारा करती हुई अपनी क्लास में चली गई.

मैं विकास से बात करने के लिए आगे बढ़ी, तभी उस का कोई दोस्त आ गया और उसके बाद टीचर आ गईं.

इंटरवल में विकास को मैं ने इशारे से स्कूल के गार्डन में उस जगह बुलाया, जहां थोड़ा सुनसान था.

विकास के आते ही मैं ने गुस्से में उसे एक झापड़ मारा और कहा, “तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी, मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं बची,” इतना कह कर मैं रोने लगी. वह भी पलट कर मुझे थप्पड़ मारने वाला था, पर मुझे रोते देख कर वह रुक गया और चिल्ला कर बोला, “क्या बकवास कर रही हो?”

मैं ने उसे सारी बात बता दी. यह सुन कर वह भी सोच में पड़ गया. बोला, “अरे यार, अभी तो मैं खुद बच्चा हूं. कुछ कमाता भी नहीं हूं. मेरे घर वाले भी मुझे बहुत मारेंगे, अगर यह सब उन को पता चला. पर सच में अगर मुझे यह पता होता तो मैं तुझे नहीं काटता.” उसे बहुत अफसोस हो रहा था.

“एक बात बता, तू ने उस किट से टैस्ट किया क्या प्रेगनेंसी का? ”

“कैसी किट…? और मैं इसे कहां से लाऊंगी?”

“अरे यार, टीवी में कितना तो विज्ञापन आता है. तुम ने देखा नहीं क्या…?” विकास झल्ला गया. बोला, “किसी भी मैडिकल शाप पर मिल जाएगी.”

“हां. और जैसे मैं ले ही आऊंगी… सुनो विकास, तुम्हारे कारण मैं इस मुसीबत में पड़ी हूं, अब तुम्हें ही यह सब करना होगा.”

“ठीक है, मेरे दोस्त का भाई एक मैडिकल की दुकान पर काम करता है. मैं उन से कह दूंगा लाने को.”

“इस का मतलब यह कि तुम अपने दोस्त को भी यह बताओगे. सब को पता चल जाएगा, कितनी बदनामी होगी,” कहते हुए मैं फिर से रोने लगी.

“अरे यार, तू न ये रोनाधोना मत कर. कुछ भी कह दूंगा. वैसे भी ऐसे समय में खुश रहना चाहिए.”

मेरे कुछ पूछने से पहले ही वह मुंह बना कर बोला, “ऐसा टीवी में और फिल्मों में कहते सुना है मैं ने.”

“सुनो न , तुम अपने घर वालों से बात करो,” देखी गई फिल्मों के आधार पर मुझे शादी ही एकमात्र उपाय लग रही थी. हालांकि विकास का चपटी नाक वाला चेहरा मुझे बिलकुल पसंद नहीं था और ऊपर से उसे जब देखो तब जुकाम हो जाता था, लेकिन अभी और कोई चारा नहीं था.

खैर, हम दोनों इंटरवल खत्म होने की घंटी बजने तक यही बात करते रहे कि घर में कैसे क्या कहेंगे. फिर यह तय हुआ कि पहले एक बार किट ले कर टैस्ट कर लेते हैं. यदि रिपोर्ट पौजिटिव आती है, तो विकास अपने घर वालों से बात कर के उन को मेरे घर बात करने भेजेगा.

क्लास में आ कर मैं ने कविता को भी यह सब बता दिया था. उसे भी यही उपाय सही लगा.

स्कूल की छुट्टी के बाद जब मैं और कविता घर जा रहे थे, तभी विकास ने पीछे से आवाज दे कर रोका. मैं ने मुड़ कर देखा, तो वह भागता हुआ आ रहा था.

“सुनो, यह इमली लाया था मैं तुम्हारे लिए, टीवी में देखा है…” कहते हुए वह जितना शरमा रहा था, उस से कहीं ज्यादा मैं जमीन में गढ़ी जा रही थी. कविता ने कुहनी मार कर कहा, “देख, कितना ध्यान रख रहा है तेरा. अब ये तुझ से कभी नहीं लड़ेगा.”

घर आ कर मैं ने कागज में लिपटी इमली को खाने की कोशिश की, पर मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं हुई. वैसे भी मुझे इमली की जगह चूरन ज्यादा पसंद था, ‘लेकिन, टीवी में तो देखा है…’

दोपहर तक मेरी कल्पना डर में बदल गई कि कहीं किट की रिपोर्ट पौजिटिव आई तो क्या होगा. घर वालों को विकास के मम्मीपापा के आने पर सब पता तो चल ही जाएगा. अगर वे शादी के लिए नहीं माने तब क्या होगा? मेरी आंखों के आगे एक फिल्म का दृश्य आ गया, जहां एक लड़की  परिवार की इज्जत बचाने के लिए खुद को खत्म कर लेती है.

“नहीं… नहीं, मैं मरना नहीं चाहती,” घबरा कर मैं ने अपने दोनों हाथ अपनी आंखों पर रख लिए.

“कुछ भी हो, कैसी भी बात हो, अपने मम्मीपापा से नहीं छिपाना. वे बड़े हैं… नाराज हो सकते हैं, पर तुम्हें उस मुश्किल से भी वही निकालेंगे,” अचानक मेरे दिमाग में टीचर की बताई बात आ गई, जब वे क्लास में हम सभी से बातें कर रही थीं. मैं ने हिम्मत जुटाई और आखिरकार मम्मी को सब बताने का फैसला कर लिया.

“दादी, आप मेरे साथ जरा अंदर चलो न मम्मी के पास,” दादी की चिरौरी करते हुए मैं ने कहा.

“का हुई गवा…? कोउन्हों बदमासी की हो क्या?” दादी के झुर्रीदार गाल उन की मुसकान से भर गए.

“आप चलो तो सही,” मैं दादी की लाठी पकड़ कर उन को जबरदस्ती अंदर कमरे में ले आई, ताकि मम्मी की मार से दादी बचा सकें.

“मम्मी, मुझे कुछ कहना है. आप बैठ जाओ पहले,” मेरे कहने पर मम्मी हाथ का काम छोड़ कर कुरसी पर बैठ गईं. दादी पहले ही तख्त पर बैठ चुकी थीं.

थूक गटक कर अटकतेअटकते आंखें झुका कर मैं ने उन से कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, मैं…” और फिर मैं ने सिर झुकाएझुकाए उन से अपनी बात कहनी शुरू की. उन की आंखों की चुभन मैं महसूस कर रही थी.

मेरी बात खत्म होने के पहले ही मम्मी और दादी आशा के विपरीत जोरजोर से हंसने लगीं, “तुझे किस ने बताया कि काटने से बच्चा हो जाता है.”

“होता है मम्मी, सुजाता की बुआ ने उसे बताया था,” मैं ने दादीमम्मी की बुद्धि पर तरस खाते हुए कहा.

“ऐसा कुछ नहीं होता. मेरे भी 2 बच्चे यानी तेरे पापा और बूआ हैं और तेरी मम्मी की भी 3 बेटियां हैं.”

“काटने से नहीं होते तो कैसे होते हैं?” मैं समझ ही नहीं पा रही थी.

“बड़ी हो कर जान जाओगी. जाओ खेलो,” मम्मी ने हंसते हुए कहा, तो मेरी जान में जान आई. ‘यानी, सब ठीक है. कल बताऊंगी इस सुजाता की बच्ची को.’

मैं खुश थी कि अब विकास से मुझे शादी नहीं करनी पड़ेगी और मुझे यकीन था कि वह भी मुझ से शादी नहीं करना चाहता होगा.

‘पर काटने से बच्चे नहीं होते तो फिर…?’ सवाल अब भी अनुत्तरित था.

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