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कहानी: आत्मसाथी

वृद्धाश्रम में रघुबीर और राधा एकदूसरे का ऐसा सहारा बने कि वहां के बुजुर्ग भी ईर्ष्या करने लगे. क्या आश्रम में उन्हें आश्रय मिला या कहीं और अपना ठिकाना बसाया?

 इंसुलिन भरे इंजेक्शन की छोटी सुई लगते ही रघुबीर के मुंह से सिसकारी निकल गई. उन्हें यह रोज सहना पड़ता था, क्योंकि इंसुलिन अब उन की जिंदगी की डोर बन गई थी. और अब तो राधा के साथ जीने की लालसा ने इस कष्ट को सामान्य कर दिया था. उन की इस सिसकारी पर राधा ने कहा, ‘‘इतने सालों से इंजेक्शन लगवा रहे हो, पर सिसकारी मारना नहीं भूले. कोई छोटे बच्चे तो हो नहीं, जो इंजेक्शन लगते ही सिस्स… सिस्स… करने लगते हो.’’

‘‘अरे राधा, तुम्हें मैं बड़ा लगता हूं,’’ रघुबीर ने हमेशा की तरह कहा. अब उन के लिए तो राधा ही सर्वस्व थी. एक मित्र, साथी और प्रेमी. हां, प्रेमी भी, इसीलिए तो… जबजब राधा अपनी चश्मा चढ़ी आंखों को फैला कर इंजेक्शन भरने लगती, रघुबीर एकटक उन के चेहरे को ताकते रहते. और जब वह इंजेक्शन लगाती, रघुबीर सिसकारी जरूर भरते.

राधा को पता था कि रघुबीर ऐसा जानबूझ कर करते हैं. फिर भी वह जरूर कहतीं, ‘‘सच में इंजेक्शन से बहुत दर्द होता है.’’

इस के बाद रघुबीर के ‘न’ के साथ शुरू हुआ संवाद राधा की जिंदगी की डोर था.

2 साल हो गए थे रघुबीर और राधा को इस वृद्धाश्रम में आए. यहां पहला कदम रखने का दुख आज हृदय के किसी कोने में दब कर रह गया है. जब ये आए थे, तब दोनों के पैर साथ चलते थे और अब हृदय की धड़कन भी साथ चलती है. जैसे एक की थम जाएगी तो दूसरे की भी.

“मैं भी यहां बैठ जाऊं?’’ राधा ने पार्क में लगे झूले पर बैठे रघुबीर से पूछा. पर, रघुबीर का ध्यान तो कहीं और था. वह सामने रखे गमले में लगे कैकटस को एकटक ताक रहे थे.

‘‘मैं भी यहां बैठ जाऊं?’’ राधा ने दोबारा पूछा. इस बार भी जब कोई जवाब नहीं मिला, तो राधा झूले पर बैठ गई. थोड़ी देर तक झूले के साथ मौन भी झूलता रहा. राधा ने अचानक पैरों को जमीन पर रख कर झूले को रोकते हुए पूछा, ‘‘आप केवल कैकटस को ही क्यों देखते हैं?’’

‘‘मुझे लगता है, इस जीवन में मैं ने केवल कैकटस ही बोए हैं, इसीलिए कैकटस मुझे अच्छा लगता है. शायद इसी वजह से मैं यहां हूं भी,’’ अचानक झूले के रुकने से रघुबीर जैसे नींद से जागे थे.

‘‘कैकटस में भी फूल खिलते हैं. हो सकता है कि यह आश्रम भी तुम्हारे लिए कैकटस बन जाए,’’ राधा ने आशावादी विचार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘कभीकभी कैकटस से भी संबंध की शुरुआत हो सकती है.’’

रघुबीर जब से इस आश्रम में आए थे, उन के चेहरे पर हमेशा उदासी ही छाई रही. आश्रम में रहने वालों से वह बातचीत भी बहुत कम करते थे. हमेशा वह अकेले ही बैठे रहते थे.

एक रात 2 बजे राधा ने उन्हें झूले पर बैठे देखा था. शायद उस आश्रम में राधा ही एक ऐसी थी, जिस से रघुबीर कभीकभार दोचार बातें कर लिया करते थे. राधा ने उन के पास जा कर पूछा था, ‘‘इस समय यहां क्या कर रहे हो?’’

‘‘नींद नहीं आ रही थी, इसलिए यहां आ कर बैठ गया,’’ जवाब मेें रघुबीर ने कहा.

‘‘नींद क्यों नहीं आ रही है?’’ राधा ने पूछा. शायद वह उन से बातें करना चाहती थीं.

‘‘हर चीज की वजह नहीं होती.’’

‘‘होती तो है. बस, हम जानना नहीं चाहते,’’ राधा ने रात की हवा में जैसे नमी मिल आई हो, इस तरह कहा, ‘‘आप अपने मन की बात कह दीजिए, इस से दिल का बोझ थोड़ा हलका हो जाएगा. बात सुन लेने के बाद शायद मैं वजह खोज सकूं.’’

‘‘मैं मेजर डिप्रेशन का रोगी नहीं था,’’ रघुबीर ने रात को खुले आकाश में फैले अनगिनत सितारों को ताकते हुए कहा.

“तो…’’ राधा ने छोटा सा सवाल किया. उन्होंने ‘डिप्रेशन’ शब्द सुना न हो, ऐसा नहीं था.

राधा अध्यापिका थीं. स्वभाव से वह आशावादी थीं. हर परिस्थिति को मुसकराते हुए वह स्वीकार करती थीं.

राधा के इस सवाल से रघुबीर उत्तेजित हो कर बोले, ‘‘तो क्या… आज इसी बीमारी की वजह से मैं यहां इस वीरान वृद्धाश्रम में हूं. मैं ने अपने पोते पर हाथ उठा दिया था. और जानती हो क्यों…?’’ कहते हुए रघुबीर का शरीर कांप रहा था. आंखें सहज ही चौड़ी और लाल हो गई थीं. उन की आंखों में ठहरी बातें पाला तोड़ कर बह रही थीं.

‘‘केवल… उस से मेरी इंसुलिन की सिरिंज टूट गई थी. मैं… मैं अभी भी उस दृश्य को देख रहा हूं, क्योंकि वह दृश्य मेरी आंखों के सामने हमेशा ही नाचता रहता है. वह दृश्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा है. उसी की वजह से बेटे ने मुझे अस्पताल में भरती कराया और अस्पताल से सीधे इस वीरान आश्रम में छोड़ गया.

“मैं ने अपने पोते पर हाथ उठाया?’’ रघुबीर ने यह अंतिम वाक्य इस तरह से कहा, जैसे वह खुद से ही सवाल कर रहे हों. इतना कहतेकहते उन की सांस फूलने लगी थी.

उन्होंने एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, ‘‘वह मेरा कितना खयाल रखता था, मुझे कितना खुश रखता था. अपनी दादी के जाने के बाद वही एक सहारा था मेरा.

“आप को पता है, वह रोजाना मेरे साथ मंदिर जाता था. मेरे पास बैठ कर होमवर्क करता. कोई भी बात होती, ‘दादाजी… दादाजी’ कह कर पहले मुझे ही बताता और मैं ने…?

“मैं ने यह क्या किया…? उस की दादी का खालीपन मुझे खा गया. अकेलापन मुझ से सहन नहीं हुआ,’’ इतना कह कर रघुबीर रोने लगे. राधा ने भी उन्हें रोने दिया. वह केवल उन्हें देखती रही और उन की बातें सुनती रही. जब तक रघुबीर के मन की भड़ास न निकल गई. किसी को इस तरह सुनना भी एक कला ही है. यह कला भी सब के पास नहीं होती.

उस रात के बाद राधा रघुबीर का खयाल ही नहीं रखने लगीं, बल्कि हर तरह से उन की देखभाल करने लगीं. वह उन की देखभाल में कोई कसर नहीं रखती थीं. रोजाना याद कर के उन की दवाएं देना, इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना, अब यह सब वही करती थीं. दोनों साथ बैठ कर भगवद्गीता का पाठ करते, उस का अर्थ समझने के लिए दोनों एकदूसरे के साथ लंबे समय तक पार्क में टहलते हुए चर्चा करते. कभीकभी बातों में विरोधाभास होता, तो ‘तुम ही सच्चे हो, मैं गलत हूं’ पर बात खत्म हो जाती. इस तरह दोनों में मीठा झगड़ा भी होता. सालों बाद रघुबीर के लिए अब यह वीरान आश्रम रंगबिरंगा, फूलों से भरा उपवन लगने लगा था.

एक दिन राधा का बेटा उन से मिलने आया. उस ने मां से घर चलने को बहुत कहा, पर वह घर जाने को राजी नहीं हुईं. उस समय रघुबीर को पता चला कि राधा स्वेच्छा से आश्रम में रहने आई थीं. वह तो अपने गांव में ही रहना चाहती थीं, जबकि बेटा गांव का सबकुछ बेच कर शहर में बस जाना चाहता था. वह सादगी से जीने की आदी थीं, इसलिए उन्होंने बेटे से कहा था, ‘‘मैं वृद्धाश्रम में रहूंगी.’’

बेटे और बहू ने बहुत समझाया कि समाज में उन की बड़ी बदनामी होगी, पर वह नहीं मानीं और वृद्धाश्रम में रहने आ गई थीं. एकांत उन की प्रवृत्ति थी. वह रहती भी एकांत में ही थीं.

पर, राधा और रघुबीर को कहां पता था कि वृद्धाश्रम में आने के बाद उन्हें एक साथी मिल जाएगा, जिस से निरंतर बातें की जा सकेंगी, नाराज भी हुआ जा सकेगा और मनाया भी जा सकेगा. इतने सालों से साथ रहतेरहते उन के बीच सात्विक प्रेम का सेतु बंध गया था. दोनों एक बार फिर युवा हो गए थे. उन में फिर से प्रेम हो गया था और जिंदगी एक बार फिर से प्रेममय हो गई थी. प्रेम तो कभी भी, कितनी भी बार हो सकता है. पर प्रेम व्यक्ति से नहीं, उसके व्यक्तित्व से होता है.

रघुबीर कभी फूल तोड़ कर राधा को देते तो कभी कोई माला बना कर जूड़े में लगाते. यह सब करने में वह जरा भी नहीं शरमाते. उसी तरह राधा भी प्रेमभाव से यह सब स्वीकार करतीं. ऐसा करते हुए वह सहज हंस भी देते. इतना ही नहीं, अब दोनों एक ही थाली में साथ खाने भी लगे थे. ऐसे में ही एकदूसरे को खिला भी देते थे. बस, एक ही कौर में पेट भर जाता था.
उन दोनों के प्रेम को देख कर वृद्धाश्रम के लोग तरहतरह की बातें करने लगे थे. पर उन की बातों पर न राधा ध्यान दे रही थी और न रघुबीर. दोनों खुद ही में मस्त थे. लोग कहते, ‘‘इस उम्र में इन्हें यह सब करते शर्म भी नहीं आती. जिस उम्र में भगवान का नाम लेना चाहिए, इन्हें देखो, ये प्रेम के गीत गा रहे हैं.’’

शायद उन लोगों को राधा और रघुबीर जो कर रहे थे, उस बात पर गुस्सा नहीं था, उन्हें उन दोनों का साथ रहना खल रहा था. उन्हें इस बात की ईर्ष्या थी कि उन के साथ ऐसा क्यों नहीं है. इसी ईर्ष्या की वजह से एक बार फिर राधा और रघुबीर के जीवन में कैकटस उग आया था. उन लोगों ने आश्रम के संचालक से शिकायत कर दी कि इस उम्र में ये दोनों यह कौन सा तमाशा कर रहे हैं?

एक वृद्ध ने तो यहां तक कह दिया कि अगर इन दोनों को किसी ने इस तरह एकसाथ देख लिया तो जो लोग आश्रम को दान देते हैं, वे दान देना बंद कर देंगे कि यह आश्रम है या ऐयाशी का अड्डा.

इन्हीं लोगों की बातों में आ कर संचालक ने रघुबीर और राधा के घर वालों को फोन कर के सारी बात बताई.

रघुबीर के घर से तो कोई जवाब नहीं आया, कहा गया कि ‘आप को उन के बारे में जो निर्णय लेना हो, लीजिए. हम लोगों को अब उन से कोई मतलब नहीं है.’ जबकि राधा का बेटा राधा को ही नहीं, रघुबीर को भी अपने घर ले जाना चाहता था, पर इस बार भी राधा ने साफ मना कर दिया. तब बेटे ने यह जरूर कहा कि, ‘मुझे पता नहीं था कि मम्मी इसीलिए अकेली रहना चाहती थीं.’

यह कह कर राधा के बेटे ने एक फाइल निकाल कर राधा के सामने रखते हुए कहा, “मम्मी, मैं ने अपने एक परिचत वकील से वसीयत तैयार कराई है. ये उसी के कागज हैं. आप इस पर दस्तखत कर दीजिए, जिस से आप के न रहने पर मकान वगैरह अपने नाम कराने में मुझे कोई परेशानी न हो. बैंक से पैसे निकलवाने में भी किसी तरह की अड़चन न आए.”

राधा कुछ देर तक उस फाइल को घूरती रही. उस के बाद उस ने फाइल उठाते हुए कहा, “जरा मैं इसे रघुबीर को दिखा लूं, उस के बाद दस्तखत कर दूंगी…

“तुम अभी जाओ. इसे जानसमझ कर जब मैं दस्तखत कर दूंगी, तब तुम आ कर ले जाना.”

राधा का बेटा निराश हो कर चला गया. फिर भी उसे यह तो उम्मीद थी ही कि अपनी मां का वह एकलौता वारिस है, इसलिए मां उस के अलावा किसी और को तो कुछ देंगी नहीं.

बेटे के जाने के बाद जब राधा रघुबीर के साथ बैठीं, तो उन्होंने बेटे द्वारा लाई फाइल उन के सामने रखते हुए कहा, “जरा इसे देख कर मुझे समझाइए तो इस में क्या लिखा? बेटा मुझ से क्या चाहता है?”

“बेटा, आप की प्रोपर्टी, बैंक में जमा पैसे. आप के मरने के बाद आप के खाते में आप की पेंशन के जो पैसे बचेंगे, वह सब चाहता है. वह आप के जीतेजी ही सारे कागजात तैयार करा लेना चाहता है, जिस से आप के मरने के बाद उसे यह सब अपने हक में करने में किसी तरह की कोई परेशानी न हो,” रघुबीर ने राधा के बेटे द्वारा लाए कागज पढ़ कर बताया.

“यह सब तो मेरे मरने के बाद वैसे ही उसे मिल जाता. उसे यह सब करने की क्या जरूरत थी. क्या उसे मुझ पर विश्वास नहीं रहा कि यह सब मैं किसी दूसरे को दे दूंगी.”

“आजकल के बच्चे ऐसे ही हैं राधा. उन्हें सबकुछ शार्टकट में चाहिए. देखा नहीं, उस ने संचालक के सामने क्या कहा था. कहा था कि उसे पता नहीं था कि मम्मी इसीलिए यहां रह रही हैं. क्या हम लोग साथ रह कर कुछ गलत कर रहे हैं राधा?” रघुबीर ने राधा को सवालिया नजरों से देखते हुए कहा.

“इस बात को छोड़ो. यह बताओ कि जैसे हम अपनी प्रोपर्टी, पैसे बेटे को न देना चाहें तो…?”

“कोई बात नहीं. चीज तुम्हारी है. जिसे मन हो, उसे दो. इस पर तुम दस्तखत नहीं करोगी तो वह तुम्हारी प्रोपर्टी और पैसा कैसे ले लेगा?”

“अच्छा, मैं जिस किसी को अपनी प्रोपर्टी या पैसा देना चाहती हूं, उस के लिए मुझे क्या करना होगा?” राधा ने पूछा.

“इस के लिए कई विकल्प हैं. आप कोई भी विकल्प अपना सकती हैं. जैसे कि वसीयत, रजिस्टर्ड वसीयत, रजिस्ट्री, पावर औफ अटार्नी वगैरह,” रघुबीर ने बताया.

“इन में सब से बढ़िया विकल्प कौन सा है?”

“सब से बढ़िया तो रजिस्ट्री है. रजिस्ट्री होने के बाद कोई कुछ नहीं कर सकता. क्योंकि इस में रजिस्ट्री करने वाले के जीतेजी ही उसे कब्जा मिल जाता है. पर बाकी विकल्प भी बुरे नहीं हैं. हां, उन का भी रजिस्ट्रेशन तहसील में जा कर करा दिया जाए तो. रजिस्टर्ड वसीयत हो या पावर औफ अटार्नी, इन का भी उतना ही महत्व है, जितना रजिस्ट्री का. पर, इन में बाद में कोई हकदार अड़ंगा लगा सकता है. पर अंत में सबकुछ मिलता उसी को है, जिस के नाम रजिस्टर्ड वसीयत या पावर औफ अटार्नी होती है,” रघुबीर ने समझाया.

“अच्छा, वसीयत और पावर औफ अटार्नी में क्या अंतर है?”

“वसीयत में हम अपनी प्रोपर्टी किसी को अपने मरने के बाद देने की बात करते हैं, जबकि पावर औफ अटार्नी में हम अपनी प्रोपर्टी पर अधिकार प्राप्त करने की बात करते हैं.

“यह दो तरह की होती है. एक में जीवित रहने तक ही अधिकार होता है, जबकि दूसरी में मरने के बाद भी अधिकार बना रहता है,” रघुबीर ने कहा, “पर, तुम यह सब जान कर क्या करोगी?”

“सामने ये जो कागजात रखे हैं, उस पर दस्तखत करने के पहले यह सब जान लेना जरूरी था न?” कह कर राधा ने बेटे द्वारा दी गई वह फाइल एक किनारे रख दी.

राधा और रघुबीर के बीच का प्रेम आखिर आश्रम में रहने वाले लोगों से देखा नहीं गया. सभी ने मिल कर निर्णय लिया कि किसी भी तरह रघुबीर और राधा को आश्रम से बाहर किया जाए. आखिर किया भी वही गया. निर्णय सुन कर दोनों में से किसी ने कारण नहीं पूछा. उन्होंने तो तय कर लिया था कि अब कुछ भी हो, दोनों साथ रहेंगे. आर्थिक रूप से वे सुदृढ़ थे ही. केवल शरीर से ही थोड़ा कमजोर थे. लेकिन दोनों के मन मजबूत थे, इसलिए तन की चिंता नहीं थी. वे खुश थे, क्योंकि दोनों एकदूसरे की सांस बन चुके थे. राधा ने आश्रम के गेट से निकलते हुए कहा, ‘‘हमारा आगे का रास्ता शायद अब कैकटस का फूल होगा.’’

सचमुच उन का आगे का रास्ता कैकटस का फूल ही साबित हुआ. राधा और रघुबीर एकदूसरे का हाथ थाम कर आश्रम से निकले तो अंत तक दोनों एकदूसरे का हाथ थामे रहे.

आश्रम से निकल कर उन्होंने अपना अलग घर बसा लिया था. घर का काम करने के लिए उन्होंने नौकरानी रख ली थी. दोनों मिल कर खाना बनाते, साथ बैठ कर प्रेम से खाते. सुबहशाम साथ घूमने जाते. उन के दिन हंसीखुशी से बीतने लगे. एक दिन राधा रघुबीर के साथ तहसील गई और अपनी सारी प्रोपर्टी रघुबीर के नाम कर दी.

राधा के इस प्रेम को देख कर रघुबीर ने भी अपना सबकुछ राधा के नाम कर दिया. इसी के साथ उन्होंने अपनी वसीयत में यह भी लिखवा दिया कि अंत में जो बचेगा और उस की देखभाल जिस अस्पताल में होगी, सारी प्रोपर्टी और पैसा उस अस्पताल को मिलेगा.

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