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क्या बिहार में भाजपा की ताकत कम करने की हो रही कोशिश! समझिए सियासी पहलू

मुल्क तक न्यूज़ टीम, पटना. बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में बुरी तरह हार के बाद राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपना राजनीतिक करियर बचाने के लिए पार्टी का विलय जेडीयू में कर दिया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी उपेंद्र कुशवाहा को निराश नहीं किया और उन्हें जेडीयू संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया।

विधानसभा में करारी हार के बाद राष्ट्रीय लोक समता पार्टी में भी हुई थी फूट

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के पहले महागठबंधन से अलग होने के बाद उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में अंदरूनी कलह से जूझना पड़ा था। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर कई नेता राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को छोड़ जेडीयू का दामन थाम चुके थे। विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेताओं ने उपेंद्र कुशवाहा को ही पार्टी से बाहर कर दिया था और सभी नेता आरजेडी में शामिल हो गए थे। इसके बाद उपेंद्र कुशवाहा बचे हुए नेताओं के साथ पार्टी का विलय जेडीयू में कर दिया था।


अब लोजपा में पड़ी है फूट - क्या जेडीयू में होगा विलय?

दरअसल, रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति में जिस तरह की फूट हुई है। यह कोई अचानक घटी घटना है ऐसा नहीं कहा जा सकता। दरअसल विधानसभा चुनाव के बाद से ही लोजपा में अंदरूनी लड़ाई दिखने लगी थी। लोजपा के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान के कई फैसलों से नाराज थे। पार्टी कार्यकर्ता और नेता चिराग पासवान द्वारा लगातार नीतीश पर किए जा रहे हमले से भी खफ़ा थे।


सोमवार 14 जून को चिराग पासवान के चाचा और रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस ने पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली है। पार्टी के 5 सांसदों के बागी तेवर को देखते हुए चिराग पासवान ने भी राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ने की बात करते हुए मां रीना पासवान को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की बात कही है। यानी लोक जनशक्ति पार्टी में रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान की अहमियत अब नहीं रही।


लोजपा के जेडीयू में विलय से दोनों दलों को होगा फायदा

बिहार के राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि जिस प्रकार उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पार्टी का जेडीयू में विलय कर अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित कर लिया। उसी तरह पशुपति पारस अपना और चिराग पासवान का राजनीतिक भविष्य बचाए रखने के लिए जेडीयू में पार्टी का विलय कर सकते हैं। क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी के जनाधार में तेजी से गिरावट आ रही है। यानी आने वाले विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में पार्टी की हालत उपेंद्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोक समता पार्टी जैसी हो सकती है। जेडीयू में लोजपा के विलय से नीतीश के पार्टी का वोट प्रतिशत में भी वृद्धि होगी और 2020 विधानसभा चुनाव जैसे हालात उत्पन्न नहीं होंगे।


आने वाले चुनाव में भी बढ़ेगी जेडीयू की मांग

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रालोसपा की तरह अगर लोजपा का भी जेडीयू में विलय हो जाता है तो आने वाले 2024 के लोकसभा और 2025 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ज्यादा सीटों की मांग करेगी। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि जिस तरह नीतीश कुमार ने समता पार्टी का शरद यादव के जनता दल यू में विलय कर जॉर्ज फर्नांडिस को जेडीयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था। उसी वक्त रामविलास पासवान ने भी जनता दल यूनाइटेड से अलग होने के बाद लोक जनशक्ति पार्टी का निर्माण किया था। यह वही वक्त था जब शरद यादव के अलग होने के बाद लालू प्रसाद यादव ने राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया था।


राजनीतिक जानकार का कहना है कि वर्तमान में जेडीयू में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के बाद अगर पशुपति पारस लोक जनशक्ति पार्टी का विलय जेडीयू में करते हैं तो 2024 लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार बिहार में 23 सीटों पर दावा ठोकेंगे और 2025 के विधानसभा चुनाव में 143 सीटों की मांग करेंगे। यानी नीतीश कुमार की तैयारी सिर्फ जेडीयू को बड़ा करने की नहीं बल्कि बिहार में बीजेपी की संख्या को कम करने की भी है।

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