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Bihar Chunav 2020: गांवों में लिखी जा रही परिणाम की पटकथा, जिसके समर्थक ज्यादा निकले उसकी जय-जय

पटना. चुनावी मैराथन का दूसरा दौर समाप्त होने के बाद अब तीसरे चरण की बारी है। प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में बंद है और 10 नवंबर को मतगणना पूरी होने तक कयास व दावों का दौर चलता रहेगा।  हर चरण के साथ थोड़ी-बहुत मुद्दों की सियासत भी इधर-उधर हो रही है। आरोप-प्रत्यारोप के बीच मतदाताओं को समझाने की कोशिश। एनडीए खेमे से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार विकास की बात करते हुए पुराने दौर की याद दिला रहे हैं। वहीं, महागठबंधन से मुख्यमंत्री का चेहरा तेजस्वी यादव ने बहुत इशारों में पलटवार कहते हुए कहा है कि उनके पिता लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय दिया था। अब वे आर्थिक न्याय देंगे।

विकास बनाम रोजगार

राजद विधायक दल के नेता तेजस्वी ने रोजगार को शुरू से मुद्दा बना रखा है, जिस पर चौतरफा सियासत तेज हो चुकी है। वहीं, नीतीश कह रहे कि राज्य में तस्वीर बदली है और विकास को वे उस रास्ते पर ले जाने की कोशिश में हैं, जहां किसी को बाहर जाने की जरूरत ही नहीं पड़े। रोजगार के इन सवालों के बीच वोटर, खास तौर से युवा कहां है? वह हर बात को किस तरह परख रहा, यह बहुत महत्वपूर्ण है। असली जड़ यहीं है कि एनडीए और महागठबंधन दोनों ही की ओर से ग्राउंड लेवल पर बातें कहां तक पहुंच रही हैं। राजनीति के महारथी इसके विश्लेषण और आकलन में भी जुटे हैं।


दो चरण में 55 फीसद मतदान

दूसरे चरण में 94 सीटों पर मतदान संपन्न हो चुका है। इसके ट्रेंड को देखा जाए तो मतदान में युवाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत ज्यादा देखी गई है। महिलाएं भी बड़ी संख्या में निकली हैं। इन सबके बावजूद पिछले चरण से थोड़ा कम आंकड़ा है। यह 54.15 फीसद है, जबकि पहले चरण में 55.69 फीसद था। वैसे पूरी गणना के बाद अभी आंकड़ा थोड़ा और बढऩे की गुंजाइश है, फिर भी यह 60 फीसद से नीचे है। अब इन मतों में किसकी हिस्सेदारी ज्यादा बनती है, इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। यानी, किनके समर्थक ज्यादा तादाद में मतदान के लिए निकले। शहरी क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा कम रहा है, लेकिन यहां परंपरागत वोटिंग ट्रेंड में बहुत ज्यादा फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। ग्रामीण इलाकों में जिस तरह वोटिंग हुई है, उसमें बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि किसके समर्थक ज्यादा खुलकर बाहर निकले। मतों का बिखराव किसी भी चुनावी समीकरण को बदलने-बिगाडऩे में सक्षम है, पर इस दफे मतदाताओं से जो संकेत मिल रहे हैं, उसमें यह बहुत प्रभावी नहीं दिख रहा। यह आमने-सामने की टक्कर की राह खोलता दिखता रहा है। अब मुकाबले में जो भी टिक जाए।


मतदाताओं को श्रेणियों में बांटकर आकलन करना मुश्किल

मतदाता जिस तरह घरों से बाहर निकले, उसे भी कई श्रेणियों में बांटकर आकलन किया जा रहा है। एक बड़ी जमात युवाओं की, जिनका मतदान के प्रति उत्साह साफ दिखाई पड़ रहा था। इनमें भी खास तौर से पहली बार वोट डाल रहे युवाओं का। आधी आबादी में भी पहली बार वोट डालने पहुंचीं युवतियां। नेताओं के चुनावी भाषण से लेकर मतदान तक निश्चित रूप से मुद्दे प्रभावी रहे हैं, पर कुनबाई समीकरण पूरी तरह खारिज कर दिए गए हों, ऐसा भी नहीं है। इसका भी मायने होगा और वोटों की गणना में ये समीकरण भी अपनी भूमिका बखूबी निभाएंगे। इन सबके बीच बूढ़े-बुजुर्ग भी मतदान के लिए निकले हैं, दिव्यांगों में उत्साह देखा गया। इन सबका मिजाज भी अपना प्रभाव छोड़ेगा। शंका-आशंका और संशय का पेंच जरूर फंसा है, पर जमात की गोलबंदी कर पाने में सक्षम खेमा भारी पड़ सकता है।

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