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लॉकडाउन: मुंबई से पैदल चलकर दो युवक पहुंचे बनारस, एक हफ्ते में तय किया 1500 Km का सफर

बनारस। कोरोना वायरस की इस महामारी ने जहां जिंन्दगी को बेपटरी कर दिया है तो वहीं रोजमर्रा की ज़िंदगी जीने वाले मजदूर, श्रमिक गरीब व असहाय लोग जहां-जहां भी प्रवास कर रहे हैं उन्हें इस लॉकडाउन में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार प्रवासियों को अपने घर भेजने की लाख कवायद में जुटी है, लेकिन अभी कुछ ऐसे मामले सामने आ रहे है जहां सरकार के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। प्रवासी श्रमिक सैकड़ों किलोमीटर का सफर पैदल ही करके अपने घरों की ओर लौटने को मजबूर है। एक हफ्ते पहले मुंबई से पैदल चलकर दो युवक मंगलार को बनारस पहुंचे। दोनों को अपने घर देवरिया जाना है। दोनों युवक अबतक 1500 से ज्यादा किलोमीटर का सफर पैदल की तय कर चुके हैं।
वैश्विक महामारी कोरोना की वजह से देशभर में चल रहे लॉकडाउन के दौरान कहीं पर भूख, कहीं पर शेल्टर होम में रहने की मजबूरी तो कहीं पर मासूम बच्चों के पैदल चलने की यह तस्वीरें सरकारी दावों की पोल खोलती है। मजदूरी के अभाव में बेरोजगार हुए लोग जैसे-तैसे कर अपने घर पहुंचने की जद्दोजहद में लगे हुए है। पैदल सफर करते समय बस एक ही सपना आंखों में तैर रहा होता है कि कब अपना घर आए और वहां पर सकुुन से दो जून की रोटी खा सके। मुंबई में रहकर वेल्डिंग का काम करते थे दो युवक। कोरोना वायरस की वजह से लगे लॉकडाउन में काम बंद होने उन्हें खाने पीने की परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। 

ऐसे में युवकों ने पैदल ही अपने जिला देवरिया जाने का निर्णय किया और अलग-अलग रास्तों से अलग अलग जरियों से वे बनारस आ पहुंचे। इसी तरह मंगलवार को 1000 किलोमीटर की पैदल यात्रा तय कर पंजाब प्रांत के जालंधर से 18 मजदूर गोंडा पहुंचे। दरअसल, घर से मेहनत मजदूरी करने के लिए गैर प्रांतों में गए लोगों के सब्र का बांध अब टूट चुका है। वे हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर पहुंचने के लिए बेताब हैं। तीसरे फेज का लॉकडाउन लगने के बाद मजदूरों के सामने रोजी का संकट तो पहले ही खड़ा हो गया था। अब रोटी के भी लाले पड़ गए हैं। ऐसे में अपने घर पहुंचने के सिवाय उनको और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।

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